सोशल मीडिया का मानसिक स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
ऊंची इमारतें, लंबी सड़के और हाथ में बड़े बड़े मोबाइल और लैपटॉप लिए आलिशान गाड़ियों से निकलते हुए लोग! आधुनिक भारत का चित्रांकन बिना इन बातों को ध्यान में लाए संभव नहीं है।
देश विदेश में क्या चल रहा है, कौन सा गाना कहां प्रसिद्ध हुआ, फिल्मी सितारों के घर क्या खिचड़ी पक रही ये सब खबर झट पट सोशल मीडिया के माध्यम से स्क्रीन पर आ जाता है और लोग सुबह के नाश्ते और शाम चाय की चुस्कियों के साथ इन्हें देखना सुनना खूब पसंद करते है। गौरतलब है कि जीवन के गुजारे के लिए रोटी और मकान की ज़रूरत हो न हो बढ़िया कपड़े और मोबाइल फोन महत्वपूर्ण बन गए है। सोशल मीडिया के नाम पर बनाए गए एप्लीकेशंस जिनका निर्माण मनोरंजन और इंसान के अकेलेपन को दूर करने के लिए हुआ था वो अब इंसान को अकेला और निट्ठला करने के लिए ज़िम्मेदार होती जा रही है। आलम तो यूं है कि दिन भर में एक बार जब तक टकटकी लगा के "होम पेज" निहार ना लें तब तक चैन नहीं मिलता! लोग इस कदर प्रभावित हो रहे हैं के कपड़े, रहन सहन, खान पान यहां तक के अपने बच्चों का नाम भी अपने पसंद के अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के आधार पर रख रहे हैं! भले ही घर के भीतर मंदिर में दीपक ना जलाया हो मगर ख्वाब केदारनाथ जाने के देखेंगे ताकि वहां की वीडियो बनाए और अपने सोशल मीडिया अकाउंट पे तारीफ़ बटोर सकें। पढ़ाई लिखाई भाड़ में जाती है तो जाए मगर मैसेज इनबॉक्स और कॉमेंट बॉक्स में क्या लिखा है ये जानना जरूरी है! जिंदगी हो तो जैसी सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर की है वैसी हो वरना मज़ा ही कहां है! बड़े क्या छोटे बच्चें भी खुद को इनके अनुरूप बनाने की जद्दोजहत में लगे रहते हैं। जब तक हीरो के जैसी गाड़ी नहीं मिलेगी तब तक खाना नहीं खाएंगे!
ना जाने युवा पीढ़ी सोशल मीडिया में क्या देखती है पर जितना मैं समझती हूं उसके अनुमान से इतना ही कहना चाहूंगी के ये कलात्मकता के, सृजन्ता के, कल्पनाओं के पतन का कारण है। हां! चुनिंदा लोग है जिन्होंने इसे वैश्विक मंच मान, अपनी कला का प्रदर्शन कर प्रसिद्धि और पैसे दोनो हासिल किए हैं मगर ऐसी आबादी महज़ १ से २ प्रतिशत होगी बाकि के उपभोगता तो यहां सिर्फ समय की बरबादी कर रहे हैं! मोबाइल पकड़े पकड़े कब मिनट घंटे में बदल जाता है भान ही नहीं लगता! अब कोई सरगोष्ठी नहीं होती, कहीं चुटकुले और कविताओं वाली समाएं नहीं बंधती! कोई बच्चा मैदान में नहीं दिखता ना किताब की दुकान पर रंगीन पत्रिकाएं ही बिकती हैं! सबके पास फोन है जिसके अंदर झांक कर लोग हंस, रो, गा, नाच, पढ़ लिख सब कर ले रहें।
घूमने फिरने की, मिलने जुलने की योजना इसलिए बन रही ताकि अच्छी तस्वीरें ली जा सके! छोटी उम्र से डाइटिंग हो रही ताकि लोग शरीर की बनावट को पसंद करें! रातों की नींद इसलिए हराम है क्योंकि इनकी पोस्ट पे लाइक कम आए हैं! सोशल मीडिया pe २००० फ्रेंड्स है मगर लोग इस बात से अनजान हैं की मौहल्ले में कौन रहता है।
ये किस प्रकार की आधुनिकता है? किस प्रकार का मनोरंजन? जिस उम्र में लोगों को स्वास्थ्य पे, जीवन बनाने के बारे में, घर परिवार पे ध्यान देना चाहिए वहां लोग डॉक्टर के पास "एंटी सोशल मीडिया" की थेरेपी के लिए जा रहें! विज्ञान ने साबित किया है कि अत्यधिक सोशल मीडिया चलाने वाले लोग बुद्धिमत्ता कम होती जा रही है। ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता खाली समय में उन्हें कोई वीडियो चलाकर फोन दे देते हैं उनमें हकलापन की समस्या का भी निर्माण हो रहा है। उनका शारीरिक विकास दर भी कम हो गया है। कई रातों तक ठीक से ना सोने के कारण लोग डिप्रेशन में जा रहे हैं। मोबाइल से निकलने वाली किरणों के कारण लोगों के नेत्र की रोशनी खराब हो रही हैं। कितना शर्मनाक है ये! लोग अपना स्वास्थ्य उनके जैसा बनने की होड़ में खराब कर रहे हैं जिनका असली वजूद खुद एक प्रश्नचिह्न है! लोगो के मानसिक हालात आपातकाल जैसी स्थिति में आ गए हैं जिनका निवारण करना बहुत जरूरी है। हमें ये समझना होगा की सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन का जरिया है। यह हमें जीने का तरीका नहीं बताता, असल जिंदगी में हमें खुद जीनी होती है। हमारी खुशियों की वजह यह कृत्रिम लोग या लाइक्स नहीं बल्कि हमारे परिवार और दोस्तों का साथ और हमारे हुनर की बढ़ोतरी है। जब जब हम कुछ नया सीखेंगे हम अपना निर्माण करेंगे जब हम लोगों से मिलेंगे बात चीत करेंगे तब हम अपनी परेशानियों के हल और सुझाव भी जान पाएंगे। अतएव यहां अपनी तुलना करना बंद कर दे और अपने वास्तविक निर्माण पर ध्यान दें। कभी ज्यादा अकेलापन लगे तो चित्रकारी करें, भले ही आड़ी तिरछी लकीरे खींचे मगर अपने हाथ को और दिमाग को चलने दे। या फिर कोई पसंदीदा किताबें पढ़ें, कहानियां सुने या पुराने किसी मित्र से परिजन से बात कर लें। छोटे बच्चों के साथ खेले उन्हें कहानियां सुनाएं उनसे सकारात्मकता ले! इससे आपकी बुद्धिमत्ता और कार्यशैली में भी सुधार होगा। खुद को खुद के लिए समय दें और अपना ख्याल रखें।
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